अलविदा 2018: #MeToo के जरिए खुला कई हस्तियों के काले कारनामों का चिट्ठा, बॉलीवुड ही नहीं राजनीति भी लपेटे में आई

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साभार-गूगल

नई दिल्ली: आसाराम, राम रहीम और बाबा रामपाल… ये देश की वो धार्मिक हस्तियां है, जो कर्मकांड से ज्यादा ‘कर्म और कांड’ पर विश्वास रखते थे। यही वजह थी कि आज तक ना जाने कितनी महिलाओं को इन्होंने अपना शिकार बनाया था। जो इन बाबाओं का शिकार हुई थी वो बेचारी कुछ बोल भी नहीं पाती थी और बोले भी तो कैसे ‘बाबा’ का रौब उनकी हिम्मत के आगे भारी पड़ जाता था। जो बेचारी आगे आई भी उसे लोगों ने फुटेज पाना और मीडिया में बने रहने का जरिया समझा।

लेकिन कोई ये नहीं समझ पाया कि वो असल में न्याय चाहती थी। वो दोषी को सजा दिलाना चाहती थी। लेकिन क्या करें इस देश के लोग अपने बाप से ज्यादा ‘बाबाओं’ पर विश्वास करते थे, अपनी मां से बढ़कर बाबा की कसम का पालन करते थे। हो सकता है उस समय कोई बड़ा ‘मूवमेंट’ नहीं चलाया गया इसलिए भी किसी को न्याय नहीं मिल पाया था। यहां ‘मूवमेंट’ से हमारा मतलब एक आंदोलन से है जो पूरी दुनिया में एक नाम से चलता रहता है। वैसे तो महिलाएं कई दशकों से प्रताड़ित और उत्पीड़न का शिकार होती आ रही हैं, लेकिन उस दौर में ना तो इंटरनेट हुआ करता था और ना ही आवाज उठाने का कोई जरिया। लेकिन सोशल मीडिया के बढ़ते चलन ने उन महिलाओं को शान से जीने का एक और मौका दे दिया। सोशल मीडिया के कारण ही आज महिलाएं अपने साथ हुए अन्याय को बयां कर पा रही है और #Metoo का तो जवाब ही नहीं है। ये वो हथियार है, जो आरोपी को सजा देने के लिए काफी है। #Metoo ने महिलाओं को वैसे ही हिम्मत दी, जैसे किसी बेसहारे को बैसाखी देखते ही मिल जाती है।

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उस फिल्म के सेट की तस्वीर जब तनुश्री के साथ हुई थी छेड़छाड़ (साभार-गूगल)

अब बात जब Me Too की आ गई है तो इसके बारे में भी कुछ जानकारियां ले लीजिए, क्या पता कब आपके भी काम आ जाए। हम उसी #Metoo की बात कर रहे हैं, जिसने विदेशों से लेकर हमारे देश तक की कई हस्तियों को 7 घाटों का पानी पिला दिया। इस साल ये मूवमेंट इतना चला.. इतना चला कि अच्छे-अच्छों को उनकी नानी याद आ गई। एक किस्म से इस मूवमेंट के जरिए महिलाओं को बोलने की आजादी मिल गई थी। बस #Metoo लगा दो और उसके बाद जो आपके साथ उत्पीड़न हुआ हो वो बयां कर दो.. फिर देखो कैसे कुछ घंटों में ही सामने वाली की खाट खड़ी हो जाएगी। ये #Metoo कई महिलाओं के लिए संजीवनी जैसी थी, जो आज तक नहीं बोल पाई वो अचानक अपने साथ हुई घटना को बोलने के काबिल थी। और हां एक बात और भी जान लीजिए इस मूवमेंट में कोई उम्र की सीमा नहीं थी, कोई धर्म की बंदिशें नहीं थी यहां तक की कोई लिंग की पाबंदी भी नहीं थी। जिसे जो बोलना था.. वो बोलता गया… लड़की ने लड़के पर, महिलाओं ने पुरूषों पर.. यहां तक की लड़के ने लड़के पर और लड़की ने लड़की पर ही उत्पीड़न का आरोप लगा डाला, वैसे ज्यादातर आरोप सच ही साबित हुए हैं, इक्का-दूक्का केस ऐसा है जिसकी जांच जारी है।

ये मूवमेंट कितना चला होगा इसका अंदाजा आप ‘साल 2018 में सबसे ज्यादा सर्च किया गया मुद्दा’ देखकर लगा सकते हैं। लोग इस मूवमेंट की तह तक जाने के लिए इंटरनेट में घुसे रहे। लोगों को इसके बारे में जानने की इतनी लत लग गई थी कि जियो का फ्री 2 GB डाटा भी एक दिन में लोगों के लिए कम पड़ रहा था, खैर वाईफाई की बात ही क्या करें वो तो अनलिमिटेड रहता ही है। लोग परेशान हो गए थे ये जानने के लिए कि आखिर ये ‘#MeToo’ बला क्या है। वैसे हमें पूरा विश्वास है कि आपने जान लिया होगा कि #MeToo है क्या, लेकिन #MeToo पर जो जानकारियां आज Newsup2date आपको देगा शायद ही वो आपको कहीं ढूंढने से भी मिली होगी।

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#Metoo कैंपेन एक आंदोलन बन गया (साभार-गूगल)

क्या है Me Too/#MeToo कैंपेन/मूवमेंट ?
इस साल शोशल मीडिया (व्हाट्सउप, फेसबुक, ट्विटर) से लेकर तमाम इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंटमीडिया में #MeToo की चर्चा हो रही थी। लेकिन लोग अब उतना नहीं जानना चाहते हैं, क्योंकि हर चीज का एक समय होता है, वैसे ही #MeToo का एक समय था जब ये खूब दौड़ा, लेकिन अब समय लगभग खत्म हो रहा है तो चर्चा भी ज्यादा नहीं की जा रही है। दरअसल, #MeToo एक मूवमेंट है.. मूवमेंट कह लीजिए, आंदोलन कह लीजिए बात एक ही है। जिसके जरिए महिलायें खासकर वर्किंग वीमेन अपने साथ वर्कप्लेस/ऑफिस में हो रहे या हो चुके यौन उत्पीड़न/ छेड़छाड़ के मामलों को हैशटैग मीटू यानी #MeToo कैम्पेन द्वारा शोशल मीडिया में उठा रही हैं। जैसा कि इस कैम्पेन के नाम से ही आप समझ गए होंगे कि इसका मतलब क्या है.. जी हां ME Too मतलब मैं भी या मेरे साथ भी) यानी जो भी महिलायें इस तरह की घटनाओं का शिकार हुई हैं, या हो रही हैं, वो यह बताने के लिए कि मेरे साथ भी ये हो चुका है या हो रहा है, इस हैशटैग के साथ #MeToo कैम्पेन से जुड़ रही हैं।

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006 में अमेरिकी सिविल राइट ऐक्टिविस्ट तराना बर्क ने इस आंदोलन की शुरुआत की थी (साभार-गूगल)

कब और किसने की #MeToo की शुरूआत ?
वैसे #MeToo कैंपेन की शुरूआत साल 2006 में अमेरिका से हुई थी। साल 2006 में अमेरिकी सिविल राइट ऐक्टिविस्ट तराना बर्क ने इस आंदोलन की शुरुआत की थी। तराना बर्क खुद सेक्शुअल असॉल्ट सर्वाइवर हैं यानी वो यौन उत्पीड़न का शिकार हो चुकी हैं। एक इंटरव्यू में तराना बर्क ने बताया था कि बचपन से लेकर बड़े होने तक 3 बार उनका यौन शोषण हो चुका है। साल 2006 में तराना ‘मायस्पेस सोशल नेटवर्क’ में #MeToo के साथ अपने साथ हुई आप बीती बताई। उस समय तराना को भी नहीं पता था कि आज जो वो कर रही हैं उससे कितनी महिलाओं की जिंदगी बदल जाएगी। बता दें, मायस्पेस सोशल नेटवर्क एक तरह का सोशल नेटवर्किंग साइट है। तराना बर्क के इन दो शब्दों ने एक आंदोलन का रूप ले लिया, जिसमें यौन शोषण पीड़ितों को इस बात का अहसास दिलाने की कोशिश की गई कि आप अकेली नहीं हैं।

हॉलीवुड अभिनेत्रियां
हॉलीवुड की कई अभिनेत्रियों ने फ़िल्म निर्माता हार्वी वाइंस्टीन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं (साभार-गूगल)

लेकिन इस आंदोलन ने पिछले साल जोर पकड़ा यानी साल 2017 में जब हॉलीवुड निर्देशक हार्वी वाइन्स्टीन पर यौन दुर्व्यवहार के आरोप लगे, पूरी दुनिया में इस अभियान ने ज़ोर पकड़ लिया और अब तक आम लोगों से लेकर कई बड़ी हस्तियां इसमें शामिल हो चुकी हैं। अक्टूबर 2017 में सोशल मीडिया पर #MeToo के साथ लोगों ने अपने साथ कार्यस्थल पर हुए यौन उत्पीड़न या यौन हमलों की कहानियां सोशल मीडिया पर शेयर करना शुरू किया। लेकिन #MeToo 2017 में उस समय लोकप्रिय हुआ जब अमरीकी अभिनेत्री अलिसा मिलानो ने ट्विटर पर इसे इस्तेमाल किया। मिलानो ने यौन उत्पीड़न के शिकार लोगों को अपने साथ हुए घटनाक्रम के बारे में ट्वीट करने के लिए कहा ताकि लोग समझ सकें कि यह कितनी बड़ी समस्या है। उनकी यह कोशिश क़ामयाब भी हुई और #MeToo हैशटैग इस्तेमाल करते हुए कई लोगों ने आपबीती सोशल मीडिया पर साझा की। हैशटैग के रूप में #MeToo तभी से पूरी दुनिया में बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जाने लगा।

हैशटैग के इस्तेमाल पर आधारित मैप
साभार-बीबीसी/गूगल

वो देश जहां #MeToo ज्यादा लोकप्रिय हुआ
अमेरिका से शुरू हुए इस आंदोलन ने लगभग पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना ली है। कई देशों के लोग इस हैशटैग के जरिए कई सालों बाद सामने आए हैं। इस आंदोलन से भारत भी अछूता नहीं रहा है। भारत के अलावा कई देश ऐसे थे जहां इस हैशटैग ने बवाल मचाया था। Arabic, कनाडा, चीन, भारत, फिनलैंड, ईरान, इजरायल, जापान, पाकिस्तान, रूस, साउथ कोरिया, ताइवान यहां तक की वियतनाम में भी ये मूवमेंट खूब चला।

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भारत में इसकी शुरुआत अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने की।उन्होंने नाना पाटेकर पर छेड़छाड़ के गम्भीर आरोप लगाए(साभार-गूगल)

भारत में कब और कहां से हुई #MeToo की शुरूआत ?
कहा जाता है कि अमेरिका में जब साल 2017 में इस अंदोलन ने जोर पकड़ा उस समय ही इस आंदोलन ने भारत में भी दस्तक दे दी थी, लेकिन भारत में उतना जोर नहीं पकड़ा, जितना अमेरिका में हुआ। वैसे देखा जाये तो भारत में इसकी असली शुरुआत हाल ही में अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने की। जब उन्होंने बॉलीवुड के दिग्गज कलाकार और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित नाना पाटेकर पर एक फिल्म की शूटिंग के दौरान गलत तरीके से छेड़छाड़ के गम्भीर आरोप लगाए। इसके बाद तो पूरे सोशल मीडिया में MeToo.. MeToo छा गया और फिल्म इंडस्ट्री की एक के बाद एक हस्तियों पर #MeTo कैंपेन के तहत यौन उत्पीड़न के आरोप लगने लगे।

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पत्रकार, नेता, अभिनेता, गायक समेत कई खिलाड़ियों पर लग चुका है METoo का आरोप (साभार-गूगल)

भारत में किन-किन लोगों पर लगा आरोप ?
फिल्म इंडस्ट्री, खेल जगत, पत्रकारिता से लेकर राजनीति तक के सफ़ेद लोगों का काला सच इस अभियान के जरिये आम लोगों तक पहुंचने लगा। आलोक नाथ, साजिद खान, गणेश आचार्य, सुभाष घई, पीयूष मिश्रा, अनु मलिक, विकास बहल, चेतन भगत, रजत कपूर, कैलाश खैर, जुल्फी सुईद, सिंगर अभिजीत भट्टाचार्य, तमिल राइटर वैरामुथु आदि कई बड़ी फ़िल्मी हस्तियां MeToo के लपेटे में आई। यही नहीं MeToo के फेरे में मौजूदा मोदी सरकार भी आई। उनके मंत्री एमजे अकबर पर भी #MeToo के तहत गम्भीर आरोप लगाए गए। जिसके बाद उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था।

कानून में इसे लेकर क्या प्रावधान है ?
1992 में हुए भंवरी देवी गैंगरेप मामले के बाद विशाखा और कई दूसरे ग्रुप कोर्ट गए थे। 13 अगस्त 1997 को विशाखा फैसला दिया गया। इसमें विशाखा गाइडलाइंस दी गईं। यह वर्कप्लेस पर यौन शोषण को रोकने के लिए था। कानून न बनने तक इसे लागू करने के निर्देश कोर्ट ने दिए थे। इसके तहत…गलत तरीके से शारीरिक संपर्क, सेक्शुअल फेवर्स, भद्दी टिप्पणियां, पोर्न या उससे जड़ी चीजें दिखाना, गैरमर्यादित शारीरिक संबंध को सेक्शुअल हैरेसमेंट माना गया।

2013 में सरकार ने इसे लेकर कानून बनाया। इसके बाद कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से महिलाओं का संरक्षण (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 अस्तित्व में आया। सीनियर एडवोकेट विशांशु जोशी ने बताया कि इसके तहत हर संस्था में एक आंतरिक परिवाद समिति होना चाहिए। ये महिलाओं के साथ उत्पीड़न होने पर उनकी शिकायत सुनेगी और आगे की कार्रवाई करेगी। कोई भी महिला अपने साथ हुए शोषण की शिकायत यहां कर सकती है। इसकी जांच को पूरी तरह से गोपनीय रखा जाना चाहिए। साथ ही दोषी पाए जाने पर सर्विस नियमों के तहत संबंधित व्यक्ति पर कार्रवाई होना चाहिए।

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महिला का लैंगिग उत्पीड़न हुआ है तो वह आईपीसी की धारा 354(ए) के तहत शिकायत दर्ज करवा सकती है (साभार-गूगल)

कितनी सजा का प्रावधान...
किसी महिला का लैंगिग उत्पीड़न हुआ है तो वह आईपीसी की धारा 354(ए) के तहत शिकायत दर्ज करवा सकती है। इसमें 5 साल की सजा का प्रावधान है। इसी तरह ताकत के साथ लज्जाभंग करने जैसे कपड़े फाड़ना आदि पर आईपीसी की धारा 354 के तहत शिकायत दर्ज करवाई जा सकती है। इसमें 3 साल की सजा का प्रावधान है। महिला की लज्जाभंग करने पर आईपीसी की धारा 509 के तहत केस दर्ज होता है। इसमें 3 साल तक की सजा का प्रावधान है। सरकार ने 2013 में एक कानून बनाया था। इसके बाद कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से महिलाओं का संरक्षण (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 अस्तित्व में आया। किसी महिला का लैंगिग उत्पीड़न हुआ है तो वह आईपीसी की धारा 354(ए) के तहत शिकायत दर्ज करवा सकती है। इसमें 5 साल की सजा का प्रावधान है।