बॉलीवुड एक्ट्रेस से भी ज्यादा मशहूर हैं ये 3 भारतीय महिला वैज्ञानिक, पूरा देश करता है इनको सलाम

नई दिल्ली। विविधताओं के देश भारत में हुनर की कोई कमी नहीं है। खासतौर पर महिलाओं में हुनर इस कदर कूट-कूटकर भरा है कि आज पूरी दुनिया उनके कदमों पर झुकती है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर ऐसी ही 3 महिलाओं को सलाम करते हुए आज हम 3 ऐसी महिला वैज्ञानिकों के बारे में बताएंगे, जिन्होंने पूरे देश का सीना विश्व पटल पर गर्व से चौड़ा कर दिया है।

आज जिन तीन महिला वैज्ञानिकों के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं, उनमें भारत की मिसाइल वुमेन कहलाने वाली डॉ. टेस्सी थॉमस के अलावा भारत के गगनयान मिशन की कमान संभाल रही इसरो की महिला वैज्ञानिक वी. आर. ललिताम्बिका और भारत की पहली महिला वैज्ञानिक डॉ. असीमा चटर्जी शामिल हैं। तो चलिए जानतें हैं इनके संक्षिप्त जीवन के बारे में…

डॉ. असीमा चटर्जी का फाइल फोटो (Source: Google)

कैंसर का इलाज ढूंढने वाली वैज्ञानिक डॉ. असीमा चटर्जी

23 सितंबर 1917 को कोलकाता में जन्मी डॉ. असीमा चटर्जी पहली भारतीय महिला हैं, जिन्हें किसी विश्वविद्यालय ने विज्ञान के डॉक्टर की उपाधि दी थी। डॉ. असीमा चटर्जी का जन्म ऐसे समय में हुआ था, जब लड़कियों को हाईस्कूल से आगे पढ़ने की इजाजत नहीं मिलती थी। हालांकि, उनके पिता और मां ने पढ़ने से उन्हें कभी नहीं रोका, लेकिन परिवार के बाकी लोग ताने कसते थे।

इन सबके बावजूद असीमा चटर्जी ने 1932 में ISC का एक्जाम पास किया। इसके साथ ही उन्हें सरकार की तरफ से स्कॉलरशिप भी मिली। कॉलेज में एडमिशन लेने के बाद उन्हें पता चला कि डिपार्टमेंट ऑफ केमिस्ट्री में वह अकेली महिला हैं। 1944 में कोलकाता विश्वविद्यालय में उन्हें हॉनरी लेक्चरार नियुक्त किया गया। 1947 में असीमा चटर्जी अपनी 11 महीने की बेटी को लेकर अमेरिका चली गईं।

डॉ. आसिमा का सबसे बड़ा योगदान कैंसर के दवाई बनाने में रहा। डॉ. असीमा चटर्जी ने विंसा एल्केलॉयड्स की खोज की जिसे मॉर्डन कीमोथेरेपी में इस्तेमाल किया जाता है। आसिमा द्वारा खोजे गए विंसा एल्केलॉयड्स शरीर में कैंसर सेल्स को फैलने से रोकता है। 1982 से 1990 तक डॉ. असीमा चटर्जी को राज्यसभा सदस्य के रूप में भारत के राष्ट्रपति द्वारा नामित किया गया था। यही नहीं विज्ञान के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान पर उन्हें पद्म भूषण अवार्ड से भी सम्मानित किया गया।

मिसाइल वुमेन के नाम से दुनिया में मशहूर है डीआरडीओ की महिला वैज्ञानिक डॉॅ. टेस्सी थॉमस (Source : Google)

भारत की मिसाइल वुमेन डॉ. टेस्सी थॉमस

भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को पूरी दुनिया मिसाइल मैन के नाम से भी जानती हैं। भारत की सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए डॉ. कलाम के अतुलनीय योगदान को देश कभी नहीं भूल सकता। डॉ. कलाम के पदचिन्हों पर चलकर डीआरडीओ की महिला वैज्ञानिक डॉ. टेस्सी थॉमस आज पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन कर चुकी हैं।

अप्रैल 1964 को केरल के अल्लापुझा में जन्मी डॉ. टेस्सी थॉमस भारत की सबसे सफल महिला वैज्ञानिकों में से एक हैं। वह डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को अपना गुरू भी मानती हैं। भारतीय सेना के लिए अग्नि मिसाइलों के विकास में उनका सबसे बड़ा योगदान रहा है। अग्नि मिसाइल कार्यक्रम की पूरी जिम्मेदारी डॉ. टेस्सी थॉमस के कंधो पर ही रही। इसी वजह से भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. कलाम ने उन्हें ‘अग्नि पुत्री’ का नाम दिया था।

दुनिया में डॉ. टेस्सी थॉमस को उस वक्त पहचान मिली, जब 19 अप्रैल 2012 को भारत ने अग्नि-5 मिसाइल का सफल परीक्षण किया। 5000 किलोमीटर की दूरी तक मार करने वाली अंतर महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि-5 के परीक्षण से पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया। कुछ ही समय बाद दुनिया को पता चला कि इस मिसाइल की सफलता का पूरा श्रेय डॉ. टेस्सी थॉमस को जाता है। दरअसल, डॉ. टेस्सी थॉमस की अग्नि मिसाइल प्रोग्राम की डॉयरेक्ट हैं और उन्हीं ने अग्नि सीरीज की सभी मिसाइलों के लिए कई महत्वपूर्ण प्रणालियां विकसित की। डॉ. टेस्सी थॉमस का श्रेय इसलिए भी बड़ा है कि अग्नि मिसाइलों को पूरी तरह भारत में तैयार किया गया।

इसरो के लिए कई बड़े और सफल मिशन को अंजाम दे चुकी हैं डॉ. वी.आर ललिताम्बिका (Source: Google)

गगनयान मिशन की डॉयरेक्टर वी.आर. ललिताम्बिका

2022 में भारत अंतरिक्ष में कदम रखने की तैयारी कर चुका है। इसके लिए मिशन गगनयान शुरू किया गया, जिसकी कमान इसरो की महिला साइंटिस्ट डॉ. वी.आर ललिताम्बिका के हाथों में है। वी. आर. ललिताम्बिका अंतरिक्ष मानव मिशन की अगुवाई करने वाली दुनिया की पहली भारतीय महिला वैज्ञानिक बन चुकी हैं।

1962 में केरल के तिरुअनंतपुरम में जन्मी वी. आर. ललिताम्बिका बचपन से ही रॉकेट लांच देखकर रोमांचित रहती थीं। त्रिवेंद्रम के कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से वी. आर. ललिताम्बिका ने बीटेक और कंट्रोल इंजीनियरिंग में एमटेक की डिग्री हासिल की। इसरो में शामिल होने से पहले वी. आर. ललिताम्बिका ने कालेज में छात्रों को पढ़ाया। इसरो में नौकरी करते हुए वी. आर. ललिताम्बिका ने पीएचडी की डिग्री हासिल की।

वी. आर. ललिताम्बिका 1988 में तिरुअनंतपुरम के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर से जुड़ी थीं। वी. आर. ललिताम्बिका एडवांस्ड लांच व्हीकल टेक्नोलॉजी की एक्सपर्ट हैं। वी. आर. ललिताम्बिका अपनी टीम के साथ रॉकेट कंट्रोल और गाइडेंस सिस्टम डिजाइनिंग का काम संभालती हैं। इसरो के लिए वी. आर. ललिताम्बिका ने एएसएलवी, पीएसएलवी, जीएसएलवी और पीएलवी पर काम किया है।

वी. आर ललिताम्बिका एक ऐसा नाम है, जिसने इसरो को हर मौके पर गौरवान्वित किया है। जब इसरो ने एक ही रॉकेट से 104 सैटेलाइट्स अंतरिक्ष में छोड़कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया, तो उसमें वी. आर. ललिताम्बिका की खूब तारीफ हुई। वी. आर. ललिताम्बिका की टीम ने ही सभी सैटेलाइट्स की कक्षा को सुनिश्चित किया और यह ध्यान रखा कि कोई सैटेलाइट दूसरे से ना टकराए। उनकी टीम हर बुरी स्थिति से निपटने के लिए तैयार थी।

गगनयान मिशन की डायरेक्टर बनाई गई वी. आर. ललिताम्बिका अपनी टीम के साथ सबसे पहले अंतरिक्ष में इंसान को ले जाने वाले सिस्टम को अपनी देखरेख में तैयार और उसका परीक्षण करवाएंगी। इसके अलावा वायु सेना, डीआरडीओ, विदेशी अंतरिक्ष संस्थान, प्राइवेट इंडस्ट्री आदि से मिशन का समन्वय बनाने की जिम्मेदारी भी पूरी तरह वी. आर. ललिताम्बिका के कंधों पर है।