बिहार की धूमिल मिट्टी में जन्में इस कवि ने अपने व्ययंग के बाण से विरोधियों को किया था चारों खाने चित्त
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बिहार की धूमिल मिट्टी में जन्में इस कवि ने अपने व्ययंग के बाण से विरोधियों को किया था चारों खाने चित्त

अंदाज-ए-भारत: वीरों की कर्मभूमि हमारा देश भारत सदियों से दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। यहां एक से बढ़कर एक वीर हुए जिन्होंने अपने प्रतिद्वंदियों के छक्के छुड़ा दिए तो वहीं दूसरे तरफ कुछ ऐसे वीर भी हुए जिन्होंने अपने कलम की ताकत से दुश्मनों के पसीने छुड़ा दिए और लोगों के दिलों में राज किया। (Bihar)

A poem born in the dusty soil of Bihar| कविताओं से दिया था विरोधियों को जवाब
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अगर आप सोच रहें है कि कोई कलम के दम पर कैसे लोगों के दिलों में जगह बना सकता है, तो हम आपको बता दें कि भारत की मिट्टी ने ऐसे अनेकों लाल पैदा किए जिन्होंने इस मिट्टी के हित में, इस देश के हित में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।(Bihar)

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जी हां हम बात कर रहें है भारत की पवित्र धरती पर अपने नाम का अमिट छाप छोड़ने वाले कवि और लेखकों का। जिन्होंने अपने कला के माध्यम से लोगों को अपनी तरफ आकर्षित होने के लिए बाध्य कर दिया। जिनकी रचनाओं को पढ़कर लोगों के भीतर एक नई ऊर्जा का संचार होता था कुछ कर उठने की चाहत पैदा हो जाती थी।

A poem born in the dusty soil of Bihar| कविताओं से दिया था विरोधियों को जवाब
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इसी कड़ी में आज हम आपको बताएंगे कविवर नेपाली ( गोपाल सिंह नेपाली) की कर्मभूमि चंपारण की इस पावन धरा पर जन्म लेने वाले एक ऐसे शख्स के बारे में जिनका पूरा जीवन मां काली की भक्ति और अपने कविताओं के प्रति समर्पित है। उनके द्वारा लिखी गई कविताएं एक पल के लिए लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती है प्यार, व्ययंग और कटाक्ष को अपने भीतर समेंटे हुए उनकी रचनाएं बहुत ही प्रभावशाली है। उनकी रचनाओं को पढ़ने के बाद कोई भी आम इंसान चिंतन मनन करने पर बाध्य हो जाता है।

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कलाधर का जीवन परिचय

अपने बेबाक बोल के लिए प्रसिद्ध इस कवि का जन्म बिहार के चंपारण जिले में 7 मार्च 1948 को हुआ था। बचपन से ही तीव्र और कुशाग्र बुद्धि के मालिक इस कवि का पूरा नाम नंदन झा ‘कलाधर’ है। लोगों ने इनकी कला को परखने की कशीश को आत्मसाध करते हुए इन्हें कलाधर नाम दिया। बता दें कि बेतिया राज परिवार से ताल्लुक रखने वाले कलाधर को शुरु से ही किसी के नीचे रहकर काम करना गंवारा नहीं था। जिसके कारण उनके जीवन में कई तरह के उतार-चढ़ाव भी आए, लेकिन इतनी परेशानियों के बावजूद कलाधर अपने पथ से विमुख नहीं हुए।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि शब्दों को तोड-मरोड़ कर उसे अपने इशारों से चलाने वाले इस कवि का जीवन अब गुमनामी के अंधेरों में डूब गया है। कलाधर जिस ऊंचाई के हकदार थे वह उन्हें नहीं मिला शायद वह ऊंचाई उनसे और दूर होती चली गई। लेकिन हम आपको बता दें कि देश के एक आम नागरिक की तरह जीवन व्यतीत करने वाले कलाधर आज भी किसी पहचान के मोहताज नहीं है। उनकी जीवंत रचनाएं उनके कला का प्रत्यक्ष उदाहरण पेश करती है।

कलाधर की कुछ अनसुनी पंक्तियां

कलाधर के जीवन में तो वैसे अनेकों घटनाएं घटित हुई लेकिन उनमें से एक घटना को कलाधर ने अपने पंक्तियों के माध्यम से बयां किया है जिसमें उन्होंने अपने समकालीन कवियों के एक षड़यंत्र के बारे में बताया है। उस कविता की कुछ पंक्तियां हैं-

वाह-वाही के लिए होती नहीं अब शायरी,
शायरी में दर्द का एहसास होना चाहिए।

आदमी हो आदमी का तकाजा है यहीं,
कुदरती कानून पर विश्वास होना चाहिए.............

71 वर्ष के उम्र हो जाने के बाद भी उनकी कविताओं में आज भी वही जोश और वहीं जूनून देखने को मिलता है, जो सालों पहले देखने को मिलता था। लेकिन इतनी कविताएं लिखने के बाद भी न जाने क्यों यह लोगों के नजरों से ओझल होते चले गए।

शब्दों के जादूगर कहे जाने वाले इस कविश्रेष्ठ को शत्-शत् नमन।

4 July, 2019

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