क्या हुआ जब हनुमान ने शिवलिंग हटाने का किया प्रयास
श्रद्धा के भाव

क्या हुआ जब हनुमान ने शिवलिंग हटाने का किया प्रयास

वाल्मीकि द्वारा लिखी हुई रामायण से कौन वाकिफ़ नहीं है, रामचरित्र मानस हिन्दू धर्म के सबसे पवित्र ग्रंथो में से एक है और ये एक सांस्कृतिक धरोहर है, सामान्यतः सभी हिन्दू परिवारों में रामायण को घरो में बने मंदिरो में रखा जाता है और समय समय पर उसका पाठ किया जाता है। कहा जाता है जब कभी भी रामायण का पाठ होता है वहां उस वक़्त अदृश्य रूप में हुनमान जी उपस्थित होते है।

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आज हम आपको तमिल रामायण के ‘इरामवताराम’ की एक प्रचलित कथा के बारे में बताएंगे। ‘रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना’, इस कथा का उल्लेख स्कंदपुराण में भी है। इस कथा के अनुसार जब श्री राम लंका पर जीत हासिल करके वापस अयोध्या जा रहे थे तो गंधमादन पर्वत पर आराम करने के लिए रुके थे, वहीं पर उन्हें कुछ ऋषि मुनियों ने बताया कि उन पर ब्रह्महत्या का दोष है। ये दोष केवल शिवलिंग की पूजा करने से ही खत्म होगा।

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हनुमदीश्वर की कहानी

श्री राम ने उसी वक़्त हनुमान को शिवलिंग लाने कैलाश पर्वत भेजा। जब हनुमान जी कैलाश पहुंचे तो वहां भगवन शिव नहीं थे उन्होंने उसी वक़्त तप करना शुरू कर दिया और उधर मुहूर्त निकला जा रहा था। भगवान शिव शंकर ने हनुमान की पुकार सुनकर उन्हें दर्शन दिए और आशीर्वाद स्वरुप एक अद्भुत शिवलिंग भी प्रदान किया। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। माता सीता ने मुहूर्त ख़त्म होने से पहले बालू के शिवलिंग बना कर श्री राम को दे दिए और राम ने उस शिवलिंग की स्थापना करके पूजा की।

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जब हुनमान जी वहां पहुंचे तो वहां शिवलिंग पहले से ही स्थापित थे ये देख कर हनुमान ने श्री राम को कहा कि ‘है प्रभु आपके कहने पर में कैलाश गया और शिवलिंग लेकर आया और आपने यहां पर पहले से ही शिवलिंग स्थापित कर दिया है। और ये शिवलिंग तो बालू का है यह ज्यादा समय तक टिक नहीं पाएगा जबकि मेरा लाया हुआ पाषाण का शिवलिंग काफी समय तक चलेगा।

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श्री राम ने हनुमान के मन की भावनाओ को समझते हुए कहा कि ‘हे हनुमान इस में दुखी होने वाली कोई बात नहीं है लेकिन अगर तुम चाहते हो और तुम्हारा मन है तो तुम इस शिवलिंग को हटा कर अपना शिवलिंग स्थापित कर लो।’

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यह सुनकर हनुमान जी ने सोचा कि मेरे एक प्रहार से पर्वत तक टूट जाते है तो ये तो मामूली सा बालू का शिवलिंग है।’ अहंकार से भरे हनुमान जी ने ये सोच कर शिवलिंग को हटाने के सारे प्रयास कर लिए लेकिन वो शिवलिंग हिला भी नहीं इस प्रयास को करते हए हनुमान जी थक कर मूर्छित हो गए और जब होश में आए तो भगवन राम से माफ़ी मांगी। श्री राम ने हनुमान द्वारा लाए शिवलिंग को स्थापित किया और उसका नाम हनुमदीश्वर रखा।

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शिवलिंग स्थापित करने के बाद श्री राम ने कहा ‘मेरे द्वारा स्थापित किए गए इस ज्योतिर्लिंग से पहले तुम्हारे द्वारा स्थापित किए गए शिवलिंग की पूजा करना जरूरी है वरना भक्तो को महादेव के दर्शन का फल प्राप्त नहीं होगा।

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इस प्रकार वहां स्थापित शिवलिंग और ज्योतिर्लिंग की बहुत मान्यता है, कहा जाता है सच्चे मन से मांगने पर आज भी प्रभु महादेव और हनुमान जी भक्तो की मनोकामनाएं पूरी करते है। रामायण के संक्षिप्त कहानी को इस श्लोक द्वारा भी बताया जा सकता है।

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आदौ रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं कांचनं
वैदेहीहरणं जटायुमरणं सुग्रीवसंभाषणम् ।
वालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनं
पश्चाद्रावणकुंभकर्णहननमेतद्धि रामायणम् ॥
॥ एकश्लोकि रामायणं सम्पूर्णम् ॥

रामायण का श्लोक

ये लेख केवल धर्म के प्रति लिखा गया है, साथ ही धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित है। जिसे केवल जनरुचि के लिए लिखा गया है।

9 October, 2019

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Ashish Jain