गंगा दशहरा: हजारों पापों से दिलाती है मुक्ति, इस शुभ मुहूर्त में करें दान और गंगा स्नान

Special Desk: भारतीय संस्कृति में नदियों को माता की उपाधि दी जाती है और इसी परिपेक्ष में हमारे देश में नदी पूजन की भी एक विशेष श्रद्धा और परंपरा चली आ रही है। नदियों को श्रद्धा के साथ लोग पवित्रता का भी प्रतिक मानते हैं। भारतीय इतिहास में भी नदियों का बहुत ही खास महत्व रहा है। हड़प्पा सभ्यता( जिसे भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता के तौर पर जाना जाता है) वह भी सिंधु नदी के तट पर विकसित हुई थी। साथ ही अगर हम बात करें अपनी पौराणिक गाथाओं की तो हम देखेंगे की हिन्दू धर्म में नदियों को देवी माना जाता था।

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आपको बता दें की हिन्दू ग्रंथों में रामायण से महाभारत तक में भी नदियों के पूजन का विशेष महत्व रहा है। जहां एक तरफ रामायण में राम ने नदी की पूजा कर लंका तक पहुंचने का रास्ता बनाया। वहीं दूसरी ओर महाभारत में गंगा ने भीष्म जैसे ज्ञानी पुत्र को जन्म देकर शांतनु के कुल का उद्धार किया।

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भारत के हर कोने में नदियों की अपनी अलग ख़ासियत है। भारत में गंगा को सबसे पवित्र नदी माना जाता है, हम गंगा जल को बहुत ही पवितत्रा के साथ आपने शुभ कामों में जैसे पूजा एवं शुद्धिकरण के लिए उपयोग करते हैं। कहीं गंगा, तो कहीं ब्रह्मपुत्रा के नाम से प्रचलित नदियां नाम से तो अलग है, लेकिन सभी नदियों के लिए हर कोने से लोगों की आस्था और श्रद्धा वही एक है।

आज गंगा दशहरा के अवसर पर हम भारतीय पौराणिक इतिहास के उन पन्नों की चर्चा करेंगे जिससे आज के शुभ दिन की शुरुआत हुई थी। आईये जानते हैं गंगा दशहरा से जुड़े कुछ ख़ास एवं रोचक तथ्य –

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धरती पर गंगा का अवतरण ही है गंगा दशहरा की शुरुआत (पौराणिक)-

सृष्टि के दाता और निर्माता ब्रह्म देव के कमंडल से पवित्र गंगा को भगवान शिव की जटा के माध्यम से धरती पर अवतरित करने का श्रेय राजा भागीरथ को जाता है। राजा भगीरथ के अथक प्रयासों से ही मां गंगा मनुष्यों के उद्धार के लिए धरती पर अवतरित हुई थी। तब से यह खास दिन गंगा दशहरा के नाम से प्रचलित है। धरती पर आने से पहले गंगा स्वर्ग में निवास करती थीं।

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ऐसा माना जाता है की राजा भगीरथ अपने पूर्वजों के मृत आत्माओं का उद्धार और पापमुक्त करने के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाना चाहते थे। इसी परिपेक्ष में उन्होंने गंगा की उपासना की और वरदान के रूप में उन्हें पृथ्वी पर आने की प्रार्थना की थी। लेकिन गंगा का वेग अत्यधिक होने के कारण वह धरती पर सामन्य रूप से नहीं आ सकती थीं, क्योंकि वेग से पृथ्वी पर गंगा का आगमनं बहुत ही विनाशकारी हो सकता था।

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इसलिए राजा भागीरथ ने भगवान शिव की उपासना की, क्योंकि सिर्फ एक शिव ही ऐसे देव थे जो गंगा के वेग को सहन कर सकते थे। उपासना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने भागीरथ की मनोकामना पूरी करते हुए गंगा को स्वर्ग से सीधे अपनी जटा में अवतरित कराया जिससे धरती पर गंगा के आगमन में आसानी हो गयी और भगीरथ के पूर्वजों का उद्धार भी।

ऐसे करें गंगा दशहरे की शुरुआत –

हर साल ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दसवीं तिथी को गंगा दशहरा मनाने की परंपरा है। इस दिन सुबह जग कर गंगा स्नान करें , अगर संभव नहीं हो पाए तो किसी भी नदी में या फिर घर पर ही गंगा जल मिलाकर स्नान कर लें। इस दिन बहुत ही शुभ मुहूर्त होता है ,ऐसे में दान करने का बहुत ही ख़ास महत्व होता है। नदियों की तट पर सूर्य की पूजा का भी महत्व है।

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गरीबों में दान का विशेष महत्व –

नदियों की तट पर सुबह पूजा करना एवं गरीबों में दान करने से सुख समृद्धि बढ़ती है। ऐसा माना जाता है की इस दिन आप ठंडक प्रदान करने वाले वस्तुओं को दान करना होता है। फल ,पंखा सत्तू एवं ठंडक देंने वाली वस्तुएं दान कर सकते हैं।

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गंगा दशहरे के अवसर पर इन जगहों पर होता है ख़ास आयोजन-

यूं तो भारत के हर क्षेत्र में नदियों को देवी के रूप पूजा जाता है लेकिन इस ख़ास अवसर पर कुछ जगहों पर बहुत ही शानदार एवं भव्य आयोजन किया जाता है। इस आयोजन में गंगा आरती एवं गंगा पूजन किया जाता है। इस दिन देश के कोने कोने से श्रद्धालु ऋषिकेश, प्रयागराज, वाराणसी जैसे तीर्थस्थलों पर पहुंचते हैं और गंगा नदी में स्नान कर आरती में शामिल होते हैं।

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क्योंकि हम भारत में रहते हैं और भारतीय संस्कृति में नदियों के प्रति ख़ास सम्मान ,श्रद्धा और परम्परा प्राचीन समय से ही चलती आयी है ,इसलिए आप सभी पाठकों से आग्रह है कि नदियों की वर्तमान स्थिति को सुधारने की कोशिश करें और लोगों में जागरूकता फैलाएं। नदियों को साफ रखें और दूषित न करें क्योंकि इसी जल को आप पवित्रता का प्रतिक मानते हैं।

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