नवरात्रि स्पेशल: जानिए क्यों माता ‘शैलपुत्री’ का होता है पहला दिन
श्रद्धा के भाव

नवरात्रि स्पेशल: जानिए क्यों माता ‘शैलपुत्री’ का होता है पहला दिन

माता की नवरात्रि 29 सितंबर से शुरु होने जा रही है, जिसको लेकर लोग अपने घरों में जोरों-शोरों से तैयारियां कर रहे हैं। कहते हैं कि नवरात्रों में शेरावाली माता लोगों के कष्ट मिटाने के लिए धरती पर आती हैं। श्रद्ध के खत्म होने के बाद नवरात्रि का प्रारंभ हो जाता है। इस अवसर पर मंदिरों में खासा रौनक देखने को मिलती है और रात्रि के समय मंदिर की सजावट देखने लायक होती है। लाइटों की वजह से मंदिर पूरी रात जगमगाते रहते हैं। बड़े मंदिरों में भक्तों का आना जाना लगा रहता है।

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मंदिरों में माता की भव्य मूर्तियों का बहुत भी विशेष शृंगार किया जाता है। जिनमें दिन-रात माता की अखंड ज्योति जगाई जाती है। 9 दिन वाले नवरात्रों में माता के अलग-अलग 9 रूपों को पूजा जाता है। नवरात्रों के पहले दिन दुर्गा मां का पहला रुप शैलपुत्री(Mata Shailputri) होता है। माता को शुद्ध देसी घी का भोग लगाया जाता है और देसी घी से निर्मित चीज़ों का भोग लगाया जाता है।

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कैसे मिला माता को ‘शैलपुत्री’ नाम(Mata Shailputri)

पहले दिन की शुरुआत शैलपुरी माता के आगमन से होती है। माता शैलपूर्ति हिमालय की पुत्री के रुप में जन्म लिया था। इसलिए उनका नाम शैलपुत्री रखा गया। माता शैलपुत्री का वाहन बैल होता है। बैल को वृष भी कहते हैं, जिस वजह से माता शैलपुत्री को वृषारूढ़ा भी कहा जाता है। माता शैलपुत्री का स्वरुप बहुत ही सुन्दर होता है। उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल होता है। शैलपुत्री देवी दुर्गा का ही पहला रूप है। इन्हीं माता को सती के नाम से भी जानी जाती है। जिसके पीछे एक कहानी भी प्रचलित है यह कहानी कई मान्यताओं के साथ जुडी हुई है।

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माता शैलपुत्री की कहानी  

एक बार की बात है जब प्रजापति ने यज्ञ किया था। प्रजापति ने समस्त देवी और देवताओं को यज्ञ में शामिल होने के लिए निमंत्रण भेजा था। मगर उन्होंने भगवान शिव जी को निमंत्रण नहीं भेजा था। मगर शिव पत्नी सती उस यज्ञ में जाने के लिए व्याकुल थीं। तब शिव जी ने कहा कि उन्होंने ने हमे यज्ञ में शामिल होने का निमंत्रण नहीं भेजा है। तो वह पर हमारा जाना उचित नहीं होगा। मगर सती के कहने पर शिव जी ने सती को यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी थी।

सती के अपने घर जाने पर उन्हें बस उनकी मां ने स्नेह किया। घर के और किसी सदस्य ने उन्हें स्नेह नहीं किया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास था। शिव जी के प्रति तिरस्कार के भाव थे। भगवान शिव जी को अपमान जनक बातें कही जा रही थीं। वह अपने पति शिव जी का अपमान सहन नहीं कर पाई और यज्ञ की आग में कूद कर खुद को भस्म कर लिया। इस पर भगवान शिव जी क्रोधित होकर यज्ञ को विध्वस कर दिया। माता सती का ही अगला जन्म शैलपुत्री के रूप में हुआ था।  

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28 September, 2019

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Ashish Jain