प्रकृति के सुकुमार सुमित्रानंदन पंत का जन्मदिन आज।

नई दिल्ली। हिंदी काव्य में बड़े शान से लिए जाने वाले नामों में एक नाम सुमित्रानंदन पंत का भी आता है। पंत अपनी कविता और रचना से सबका ध्यान केंद्रित कर एक काल्पनिक दुनिया का विचरण कराने वाले इस काव्य जगत के मसीहा का जन्म कौसानी बागेश्वर(अल्मोड़ा ) में 20 मई1900 हुआ था।आज ऐसे महान कवि के जन्मदिन के अवसर पर हम बात करेंगे उनके जीवन और उनकी रचनाओं के बारे में जो हमे साहित्य और रचनओं की ख़ास जानकारियां देगी।

व्यक्तित्व की बात करें तो पंत बड़े ही आकर्षक वेश में रहते थे ,गोरा रंग,सुन्दर चेहरा और घुंगराले लम्बे बाल,और सुन्दर शरीर की बनावट सबकी नजरे खिंच लेती थीं। कहते हैं की कला और विद्या किसी की मोहताज या गुलाम नहीं होती। कला किसी की उम्र देख कभी नहीं आती। बस ऐसा ही कुछ हुआ था सुमित्रानंदन के साथ, केवल 7 साल की उम्र में पंत ने कविताएं लिखनी शुरू कर दी थी। इनकी वेश के साथ इनकी कविताएं भी बहुत ही आकर्षित होती थीं। इनकी बचपन की कविताएं वीणा के माध्यम से संगृहीत की गयी थी।

छायावाद के चार स्तंभों में एक स्तंभ सुमित्रानंदन पंत को कहा जाता है। पंत की कवितायेँ और रचनाये पाठकों को एक अलग ही दिशा दिखाते हुए प्रकृति के अगाढ़ सत्य से परिचय करा देती हैं। सुमित्रानंदन पंत को प्रकृति के सुकुमार के नाम से भी जाना जाता है। पंत की कविताएं प्रकृति से जुडी हुयी होती थी। और माना जाता है की पंत को प्रकृति से बहुत ही लगाव था उनकी सभी कवितायें प्रकृति के जरिये ही संदेश देती हैं। लेकिन एक समय के बाद पंत ने छायावाद के विचारों से ओत प्रोत रचनाये भी की है। उनकी रचनाओं का मुख्य उद्देश्य जनसमुदाय को अपनी जरिये सूचनात्मक संदेश देना होता था।

‘झर पड़ता जीवन -डाली से
मैं पतझड़ का-सा जीर्ण -पात
केवल ,केवल जग -कानन में
लेन फिर से मधु का प्रभात।”

ये पंक्तियाँ प्रकृति कुमार पंत की है, पंत की कविताएं दिल को झकझोर कर सत्य की मार्ग पर एक बार अवश्य देखने को मजबूर कर देती हैं। वाणी ,पल्लव पंत के कुछ ख़ास रचनाएँ हैं जिनमे उनकी प्रगतिशील विचारधार देखी है। सुमित्रानंदन पंत ने कभी प्रकृति सौंदर्य की रचनाएँ की तो कभी प्रगतिवाद के विचारधरा से सम्बन्धित कविताएं लिखी है साथ ही उन्होंने छयावाद का भी लेखन किया है। बदलते वक़्त के साथ पंत ने अपनी रचनाओं का मुख मोड़ते हुए एक आलोचक की भांति भी समाज पर तंज कसते हुए रचनाएँ की है। पंत की कविताओं में अरविन्द दर्शन एवं लोककल्याण से समाहित रचनाएँ भी देखने को मिलती हैं।