शहादत दिवस: सिक्खों के धर्मग्रंथ के रचयिता को झेलना पड़ा था जहांगीर की क्रूर नीतियों का कहर
शख्सियत

शहादत दिवस: सिक्खों के धर्मग्रंथ के रचयिता को झेलना पड़ा था जहांगीर की क्रूर नीतियों का कहर

Special Desk: Shahadat Divas, हमारे देश भारत को सदियों पहले से ऋषि-मुनियों का देश कहा जाता है। यहां सभी धर्मों के लोग रहते हैं एवं यहां की सभी धर्म के धार्मिक संस्थानों की अपनी अलग-अलग मान्यताएं हैं। यहां ऋषि-मुनियों के साथ साथ कई ऐसे धार्मिक गुरु भी हुए, जिन्होंने विश्व में भारत को एक शांति प्रिय देश के रुप में उजागर किया।

  • जिनके द्वारा कही गई बातों को लोग पत्थर की लकीर मानते हैं। उनके आदर्शों का पालन करते हुए उनके बताएं राहों पर चलते है।
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  • Shahadat Divas, आज हम एक ऐसे सख्स के बारे में बात करेंगे, जिन्होंने सिक्खों के धर्मग्रंथ गुरुग्रंथ साहिब की रचना की थी। अपने मृत्यु को एकदम समीप से देखकर भी विचलित हुए बिना परमेश्वर को याद करने वाले यह धर्मात्मा कोई और नहीं सिक्खों के चौथे गुरु रामदास के सुपुत्र एवं सिक्खों के पांचवें गुरु अर्जुन देव जी महाराज थे।

‘तेरा किया मीठा लागै
हरि नामक पदार्थ नानक मांगै’।।

गुरु अर्जुनदेव ने रखा था स्वर्ण मंदिर की नींव

उनके अनुनाईयों ने उन्हें ब्रह्मज्ञानी की संज्ञा दी थी। इन्होंने मुगल सम्राट जहांगीर के शासनकाल में सिक्खों के प्रमुख धर्मस्थल अमृत शहर के स्वर्ण मंदिर की नींव रखी थी।

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इनका जन्म 15 जून 1563 ई. को हुआ था, सन् 1604 में इन्होंने अपने अनुयायी गुरुदास की सहायता से गुरुग्रंथ साहिब का संपादन करना शुरु किया। जिसमें उनसे पहले हुए चार गुरुओं की उपदेशों को भी अंकित किया गया हैं।

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बता दें कि गुरुग्रंथ साहिब के संपादन के समय भारत पर मुगलों का आधिपत्य था। कुछ असामाजिक तत्वों ने तत्कालीन शासक मुगल बादशाह अकबर के कान भरें कि गुरुग्रंथ साहिब में मुस्लिम धर्म के विरोध के बारे में लिखा गया है।

जिसे सुनकर बादशाह अकबर तिलमिला गया था हालांकि जांच पड़ताल में ऐसी कोई बातें सिद्ध नहीं होई, जिसके बाद अकबर ने गुरुदास के माध्यम से गुरु अर्जुनदेव को 51 मोहरें भेंट कर खेद व्यक्त किया था।

शाहजहां के विद्रोह ने लिया गुरु अर्जुनदेव की जान

कहा जाता है कि इस दुनिया में ईमानदारी एवं सच्चें मन से काम करने वाले लोगों को विभिन्न तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है, ठीक ऐसा ही कुछ हुआ था गुरु अर्जुनदेव के साथ।

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बता दें कि अकबर के बेटे जहांगीर ने शासन की बागडोर अपने हाथों में लिया था, और जहांगीर के बेटे राजकुमार खुर्रम ( जो कि बाद में शाहजहां के नाम से प्रसिद्ध हुआ ) ने सता के लालच में अपने पिता मुगल सम्राट जहांगीर के खिलाफ विद्रोह कर दिया था।

जहांगीर की क्रूर नीतियों के शिकार हुए अर्जुनदेव जी महाराज

Shahadat Divas, जहांगीर को ऐसी खबर मिली थी कि राजकुमार खुर्रम गुरु अर्जुनदेव के सानिध्य में काम कर रहा था और गुरु अर्जुनदेव ने उसे अपने यहां शरण दे रखी थी। इस बात से नाराज होकर जहांगीर ने गुरु अर्जुनदेव को गिरफ्तार कर लिया और इस क्रूर शासक ने बहुत ही निर्मम तरीके से गुरु अर्जुनदेव की हत्या कर दी।

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कहा जाता है कि 16 जून 1606 को जहांगीर ने यासा और सियासत कानून के तहत उन्हें गर्म तवे की तख्ती पर बैठाकर, उनके ऊपर तब तक गर्म रेत डलवाता रहा जब तक वे पूरी तरह झुलस नहीं गए। पूरी तरह झुलस जानें के बाद उन्हें रावी नदी के ठंडे पानी में नहाने के लिए भेज दिया गया। जहां रावी के जल में ही गुरु जी ने अपना शरीर त्याग दिया और उनकी आत्मा परमात्मा में विलीन हो गई। उसी जगह पर रावी नदी के किनारे गुरुद्वारा डेरा साहिब का निर्माण किया गया है। जो कि अब पाकिस्तान के लाहौर में है।

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समाज के लिए गुरु अर्जुनदेव का सबसे बड़ा संदेश था कि परमेश्वर के रजा में राजी रहना। ईश्वर जो भी करता है अच्छे के लिए करता है। गुरु अर्जुनदेव की याद में पूरा देश एवं सिक्ख समुदाय के लोग प्रतिवर्ष इस दिन को शहादत दिवस/ शहीद दिवस के रुप में मनाते है।

समाज को सच्चाई के पथ पर ले जाने और सच्चाई से अवगत कराने में अहम योगदान देने वाले इस महान धर्मात्मा को हमारा शत-शत नमन।

16 जून, 2019

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