सरदार भगत सिंह की फांसी रोकने के लिए चाचा नेहरु के पास गए थे आजाद, लेकिन मिली थी निराशा
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सरदार भगत सिंह की फांसी रोकने के लिए चाचा नेहरु के पास गए थे आजाद, लेकिन मिली थी निराशा

शख्सियत डेस्क:(Chandra Shekhar Azad In Hindi) भारत की आजादी में देश के सभी लोगों ने योगदान दिया था। लेकिन कुछ लोग कहते है कि गांधी जी के अहिंसावादी विचारधारा के कारण आजादी मिली। तो वहीं कुछ लोग कहते है कि देश की आजादी में क्रांतिकारियों का योगदान सबसे अहम था। यह बात कुछ हद तक सही भी है, क्योंकि देश की आजादी में क्रांतिकारियों से लेकर नेताओं तक सबका योगदान था। किसी भी एक व्यक्ति या फिर किसी भी एक संगठन के प्रयास से आजादी नही मिली थी। आजादी की लड़ाई में देश की जनता, क्रांतिकारी संगठन एवं कुछ नेताओं का योगदान था।

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क्रांतिकारी आजाद की जीवन गाथा

इसी कड़ी में आज हम आपको भारत के एक ऐसे सपूत के बारे में बताएंगे, जिन्होंने अंग्रेजों की नींद हराम कर दी थी। जी हां, अंग्रेजों के अंदर खौफ पैदा करने वाला क्रांतिकारी कोई और नहीं, हमारे चंद्रशेखर आजाद(Chandra Shekhar Azad In Hindi) थे। चंद्रशेखर आजाद का पूरा जीवन देश की रक्षा करते हुए बीत गया। बता दें कि सन् 1919 में जालियांवाला बाग हत्याकांड के समय आजाद एक कॉलेज स्टूडेंट थे।

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सन् 1921 में गांधी जी ने असहयोग आंदोलन शुरु किया। जिसमें देश के सभी युवाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, आजाद भी उन्हीं में से एक थे। असहयोग आंदोलन में हिस्सा लेने के कारण सन् 1921 में उन्हें पहली बार गिरफ्तार किया गया था। जिसके बाद अंग्रेजी सरकार ने उन्हें 15 बेंतो की सजा सुनाई। पीठ पर बेंत पड़ने के साथ ही उनके मुंह से आवाज निकलता भारत माता की जय। अंग्रेज अधिकारी ने उन्हें 15 बेंत मारें और आजाद हर बेंत पर भारत माता की जय का नारा लगाते।

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असहयोग आंदोलन बंद होने के बाद विचारधारा में बदलाव

इस घटना के कुछ ही दिनों बाद चौरा-चौरी हत्याकांड हो गया। जिसके बाद सन् 1922 में गांधी जी ने बिना किसी के सहमति के असहयोग आंदोलन बंद कर दिया। जिससे देश के बहुत क्रांतिकारी नाराज हो गए। इस घटना के बाद आजाद के विचाराधरा में भी बदलाव आया। जिसके बाद क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़कर आजाद हिंदुस्तान रिब्लिक एसोशिएशन के सदस्य बन गए। रिब्लिक एसोशिएशन की सदस्यता के बाद आजाद ने क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में काकोरी हत्याकांड में हिस्सा लिया। यह घटना 9 अगस्त 1925 को घटी थी।

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जिसके बाद सन् 1927 में बिस्मिल और उनके 4 साथियों को सजा हो गई। और एसेशिएशन की सारी जिम्मेदारी आजाद के कंधे पर आ गई। आजाद ने उत्तर भारत के सभी क्रांतिकारी संगठनों को संगठित किया। और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोशिएशन का गठन किया। आजाद के जीवन की दूसरी क्रांतिकारी घटना थी, सैंडर्स हत्याकांड। बता दें कि लाहौर में पुलिस की लाठियों से घायल होने के बाद लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई थी। जिससे नाराज होकर सरदार भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद ने लाठीचार्य का आदेश देने वाले पुलिस अधिकारी सैंडर्स को मौत के घाट उतार दिया।

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गांधी जी रोक सकते थे फांसी

इस घटना के बाद आजाद के नेतृत्व में ही दिल्ली के असेंबली में बम धमाका किया गया था। जिसके बाद सरदार भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त ने खुद को गिरफ्तार करा लिया। आजाद अपनी कई कोशिशों के बाद भी इन्हें जेल से नहीं छुड़ा पाएं। ऐसा कहा जाता है कि अगर महात्मा गांधी चाहते तो वह फांसी रुकवा सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नही किया। बता दें कि इलाहाबाद के अल्फेड पार्क में आजाद अपने मित्र से इसी विषय पर चर्चा कर रहें थे, कि अंग्रेजी पुलिस का एक दस्ता वहां पहुंच गया। जिसके बाद दोनों तरफ से गोलीबारी शुरु हो गई।

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आजाद एक पेड़ के पीछे छीपकर गोली चला रहे थे। ऐसा कहा जाता है कि उनके सामने वाले पेड़ के पीछे से एक अंग्रेज अधिकारी गोलीबारी कर रहा था। और आजाद उस पेड़ को छेद कर उस अधिकारी को मारना चाहते थे। जिस प्रयास में उनकी सारी गोलियां खत्म हो गई और जब अंतिम गोली बची तो उन्होंने खुद को गोली मार लिया। कहा जाता है कि आजाद ने कहा था, अंग्रेजों की गोली उन्हें कभी नहीं मार सकती।

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इलाहाबाद के पार्क में हुए थे शहीद

इनकी शहादत की खबर सुनते ही पूरा इलाहाबाद उस पार्क में टूट पड़ा। जिस पेंड़ के नीचे उनकी मृत्यु हुई थी लोग उसे कपड़ो से बांधने लगे। लोग वहां की मिट्टी शीशियों में भर कर ले जाने लगे। जब भी देश के आजादी की बात की जाएगी तो अंग्रेजों को उनकी औकात दिखाने वाले इस क्रांतिकारी का नाम सबसे पहले लिया जाएगा। अंग्रेजों से लोहा लेते हुए देश का यह वीर सपूत भारत माता की गोद में हमेशा के लिए सो गया। इनकी स्मृति में उस पार्क का नाम चंद्रशेखर आजाद पार्क कर दिया गया।

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22 July, 2019

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