भारत को विश्व गुरू बनाने की अधूरी रह गई थी ख्वाहिश, ऐसे थे युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद

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साभार: Google

नई दिल्ली। भारत की धरती को महापुरुषों की धरती यूं ही नहीं कहा जाता है। महात्मा गांधी से लेकर स्वामी रामकृष्ण परमहंस जैसे महापुरुषों ने पूरे विश्व में भारत की धरती को निश्चित रूप से गौरवान्वित किया है। भारत की धरती पर जन्मे ऐसे ही एक सर्वकालिक महापुरुष हैं, जिन्हें दुनिया स्वामी विवेकानंद के नाम से पहचानती है।

स्वामी विवेकानंद की आज जयंती है और पूरे भारत में आज राष्ट्रीय युवा दिवस भी मनाया जा रहा है। आज के जमाने में युवा किसी न किसी से प्रेरणा लेते हैं। लेकिन, इसमें कोई दो राय नहीं कि स्वामी विवेकानंद आज भी युवाओं को सबसे ज्यादा प्रेरित करते हैं।

स्वामी विवेकानंद किसी एक वजह से नहीं, बल्कि उनके कर्मों ने उन्हें युवाओं का प्रेरणा स्रोत बनाया है। स्वामी विवेकानंद ने न सिर्फ युवाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया, बल्कि उन्हें गलत राह पर जाने से भी रोका।

आज हम बात करेंगे भारतीय संस्कृति को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने वाले महापुरुष स्वामी विवेकानंद के बारे में और जानेंगे कि उन्हें सर्वकालिक ‘यूथ आइकन’ क्यों माना जाता है?

ऐसे बीता बचपन

12 जनवरी 1863 को स्वामी विवेकानंद का जन्म कोलकाता में हुआ था। उनका वास्तविक नाम नरेंद्र नाथ दत्त था। उनके पिता कलकत्ता हाईकोर्ट के एक जाने-माने वकील थे। वहीं उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों वाली महिला थी। वह ज्यादातर समय भगवान शिव की पूजा में बिताती थी।

स्वामी विवेकानंद या यूं कहें कि बालक नरेंद्र नाथ बचपन से ही बुद्धिमान होने के साथ नटखट भी थे। स्कूल में अपने दोस्तों के साथ वह खूब शरारतें भी करते थे। घर में धार्मिक माहौल होने के कारण बालक नरेंद्र नाथ बचपन से ही संस्कारी थे। ईश्वर को जानने में उनकी रुची रोज बढ़ती जा रही थी। कई बार वह अपने घर आने वाले पंडितों से ईश्वर के बारे में ऐसे सवाल पूछ लेते थे कि वह भी चकरा जाते थे।

1879 में स्वामी विवेकानंद ने पहली डिवीजन के साथ प्रेसिडेंसी  कॉलेज में दाखिला हासिल किया।  1881 में ललित कला की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद 1884 में स्वामी विवेकानंद ने कला के क्षेत्र में स्नात्क की डिग्री हासिल की। पढ़ाई के दौरान स्वामी विवेकानंद ने धर्म, इतिहास, कला, साहित्य, वेद, उपनिषद समेत लगभग तमाम हिन्दू धर्म शास्त्रों का गहरा अध्ययन कर लिया था।

राष्ट्रभक्त विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद के अंदर राष्ट्रभक्ति कूट-कूट कर भरी हुई थी। सच कहें तो उस जमाने में भारतीय संस्कृति अंग्रेजों की वजह से हीन भाव से ग्रसित हो गई थी। ऐसे में स्वामी विवेकानंद ने कहा ‘उठो, जागो और तब तक न रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।’ स्वामी विवेकानंद के इस मंत्र ने ऐसा कमाल किया कि लोगों के अंदर देशभक्ति और कर्म से जुड़ी भावनाएं हिलोरे मारने लगी।

वह स्वामी विवेकानंद ही थे, जिन्होंने हमें सिखलाया कि देश सेवा और देशभक्ति के लिए राजनीति एकमात्र साधन नहीं है। सक्रिय राजनीति से दूर रहकर भी देश को आगे बढ़ाने की कोशिशें की जा सकती हैं। स्वामी विवेकानंद ने खुद देश सेवा के लिए परोपकार और आध्यात्म का मार्ग चुनकर युवाओं की आंखें खोली।

स्वामी विवेकानंद का आध्यात्म एक छोटी सी कुटिया में सत्संग या भजन तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने पुरुषार्थ को तरजीह दी। उन्होंने कर्म और चिंतन के बारे में सिखलाया। नतीजतन, उनकी प्रेरणा से हजारों ऐसे युवा तैयार हुए जो देश और मानव सेवा के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करने को खुद आगे आए।

स्वामी विवेकानंद का मानना था कि भारतीय संस्कृति सबसे अच्छी है। वह चाहते थे कि पूरी दुनिया हमारी संस्कृति, सभ्यता और धर्म से परिचित हो। स्वामी विवेकानंद ने इसके लिए कई प्रयास भी किए। अमेरिका के शिकागो शहर में 1893 को स्वामी विवेकानंद ने विश्व धर्म सभा में ऐसा जोशीला भाषण दिया, जिसने युवाओं को नई राह दिखाई।

स्वामी विवेकानंद ने अपने इस भाषण में विश्व पटल पर भारतीय संस्कृति की पताका फहराई। आसान भाषा में समझाएं तो अमेरिका और यूरोप के तमाम देशों में भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदान्त दर्शन स्वामी विवेकानंद के कारण ही पहुंचा। स्वामी विवेकानंद की राष्ट्रभक्ति पर कभी किसी ने उंगली नहीं उठाई। आज के समय में जहां देश के अंदर राष्ट्रभक्ति को लेकर तलवारें खिंच रही हैं, वहीं स्वामी जी का पूरा जीवन निर्विवाद रहा।

ईश्वर में थी दृढ आस्था

बचपन से ही धार्मिक माहौल में पले-बढ़े स्वामी विवेकानंद की ईश्वर में आस्था होना स्वाभाविक था। भगवान को लेकर उनके मन में हमेशा उत्सुकता बनी रही। ‘मोक्ष’ के बारे में सुनने के बाद उनकी उत्सुकता और अधिक बढ़ी तो स्वामी विवेकानंद इस सवाल का जवाब ढूंढने इधर-उधर खूब भटके।

संत-महात्माओं और पंडितों से स्वामी विवेकानंद अक्सर ईश्वर को लेकर सवाल पूछा करते थे। लेकिन, स्वामी विवेकानंद के एक सवाल के आगे बड़े से बड़े संत-महात्मा और ज्ञानी भी हार मान लेते थे। स्वामीजी उनसे प्रश्न करते थे कि “क्या आपने ईश्वर को देखा है?” ईश्वर में दृढ़ आस्था होने के बावजूद स्वामी विवेकानंद हर तथ्य को जानना चाहते थे।

ईश्वर की इसी खोज में लगे स्वामी विवेकानंद संयोगवश एक दिन स्वामी रामकृष्ण परमहंस से मिलने पहुंच गए। स्वामी विवेकानंद से उनके सामने भी अपना वही पुराना सवाल दोहराया। कहते हैं कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने अपने उत्तर में कहा- हां, मैंने ईश्वर को देखा और चाहो तो तुम्हें भी दिखा सकता हूं। इसके बाद स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने स्वामी विवेकानंद को साक्षात काली मां के दर्शन कराए और ज्ञान दिया कि ईश्वर और मानव अलग नहीं है। ईश्वर तक पहुंचने का एकमात्र साधन है प्राणी मात्र की सेवा।

रामकृष्ण परमहंस से मिले इस ज्ञान के बाद स्वामी विवेकानंद इतने प्रेरित हुए कि उन्होंने मोक्ष पाने की इच्छा त्याग दी। स्वामी विवेकानंद ने उसी दिन अपना संपूर्ण जीवन पीड़ित और दुखी देशवासियों के नाम समर्पित कर दिया। काली मां के साक्षात दर्शन के बाद स्वामी विवेकानंद ने सत्य को आत्मसात किया।

स्वामी विवेकानंद ने इसके बाद उपदेश दिया, ‘जिस पल मैंने ये जाना कि भगवान हर मानव शरीर रूपी मंदिर में विराजमान है, उसी पल से मैं हर व्यक्ति के सामने श्रद्धा से खड़ा हो गया और उसके अंदर भगवान की मूरत देखने लगा। स्वामी विवेकानंद ने आगे कहा, ‘हर वह चीज जो बांधती है, वह नष्ट हो गई है और भगवान के दर्शन करते ही मैं सभी बंधनों से मुक्त हो गया। स्वामी विवेकानंद द्वारा आध्यात्म ईश्वर और मोक्ष पर की गई इतनी सजीव व्याख्या शायद ही कहीं और देखने को मिले।

समाज और शिक्षा

1886 में जब स्वामी रामकृष्ण परमहंस का निधन हुआ, तब स्वामी विवेकानंद ने भारत भ्रमण करने का फैसला किया। स्वामी विवेकानंद ने भारत भ्रमण करते हुए हमारे समाज की समस्याओं को करीब से देखा। गरीबी और जात-पात के भेदभाव को देखकर वह काफी दुखी हुए। स्वामी विवेकानंद का मानना था कि गरीबी धर्म के कारण नहीं, बल्कि धर्म का प्रचार गलत तरीके से होने के कारण है, जो इसका मूल है।

भेदभाव पर स्वामी विवेकानंद मानते थे कि निम्न जाति में पैदा होना कुचक्र में फंसने जैसे है, जिससे निकल पाना असंभव है। उनका कहना था कि जातिगत भेदभाव खत्म करने के लिए निम्न जाति के लोगों को नीचे लाने की जगह, उन्हें सक्षम बनाना चाहिए। स्वामी विवेकानंद ने इसके लिए रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन नाम से दो संस्थाएं बनाई, जो आज भी स्वामी विवेकानंद के दिखाए मार्ग पर चलती है।

स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मठ की स्थापना समर्पित सन्यासियों की फौज तैयार करने के लिए की थी। वहीं रामकृष्ण मिशन का उद्देश्य जनसेवा की गतिविधियों के लिए था। मौजूदा समय में दोनों संस्थाएं दुनिया के कई देशों में शिक्षा, संस्कृति, आध्यात्म, चिकित्सा और मानवीय सेवा कार्य के क्षेत्र में काम कर रही है।

स्वामी विवेकानंद अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ थे। स्वामी जी कहते थे कि अंग्रेजी शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ बाबुओं और क्लर्कों की फौज तैयार करना है। इसकी जगह बच्चों को ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिए, जिनसे उनके चरित्र का निर्माण हो सके। उनका मन विकसित हो, बुद्धि का विकास और देश का हर बच्चा आत्मनिर्भर बने। स्वामी विवेकानंद ने ही लड़के और लड़कियों को समान शिक्षा देने की वकालत की थी।

एक संत की तरह अपना जीवन व्यतीत करने के बाद मात्र 40 साल की अल्पायु में 4 जुलाई 1902 को स्वामी विवेकानंद ने अपनी देह त्याग दी। भारत में स्वामी विवेकानंद जैसे संत का पैदा होना हमारे और देश के लिए सबसे बड़ा सौभाग्य रहा है। लेकिन, यह भी बड़े दुख की बात है कि युवाओं के प्रेरणास्त्रोत स्वामी विवेकानंद के महान उद्देश्य किताबों तक ही सिमट कर रह गया है। स्वामी विवेकानंद की शिक्षाएं यदि देश का हर बच्चा अपने चरित्र में समाहित कर ले, तो भारत वर्ष एक बार फिर ‘विश्व गुरू’ कहलाएगा।