fbpx

महर्षि रमण (Maharishi Ramana): दुनिया को सिखा गए जीवन का मोल, इनके आश्रम मेजीव-जंतुओं से बात करते थे शिष्य

नई दिल्ली। अद्वैतवाद विचारधार पर जोर देने वाले महान ऋषि (Maharishi) और संत महर्षि रमण की आज जयंती है।  महर्षि रमण (Maharishi Ramana) ने आत्म विचार पर बहुत बल दिया। उनके विचारों का प्रभाव भारत से लेकर विदेशों में रहा। 30 दिसंबर 1879 को तिरुचुली में सुंदरम अय्यर और अलगम्मल के घर दूसरे पुत्र का जन्म हुआ।

बचपन में ही धर्म की तरफ बढ़ा झुकाव

माता-पिता ने अपनी संतान का नाम वेंकटरमन अय्यर रखा। महर्षि रमण(Maharishi Ramana) की शुरुआती शिक्षा तिरुचुली और दिंदिगुल में हुई। बचपन से शिक्षा की जगह उनका ध्यान मल्लयुद्ध और मुष्टियुद्ध (आर्म रेसलिंग) जैसे खेले में रहा। इसी बीच रमण(Maharishi Ramana) का झुकाव धर्म की ओर भी बढ़ने लगा।

तिरुवन्नमलै पहुंचकर बने सन्यासी

1895 में तिरुवन्नमलै शहर की तारीफ सुनने के बाद रमण इस शहर की ओर आकर्षित हुए। आम लोगों से अलग रमण धर्म के प्रति झुकाव के कारण एकांत में प्रार्थना करते थे। वह जैसे-जैसे बड़े होते गए धर्म की ओर उनका झुकाव बढ़ता रहा। आखिरकार रमण (Ramana) तिरुवन्नमले पहुंचे और यहीं उन्होंने सन्यास धारण कर लिया।

25 सालों तक किया तप

महर्षि रमण (Maharishi Ramana) इसके बाद पठाल लिंग गुफा में चले गए जहां उन्होंने 25 सालों तक तप किया। कहते हैं कि जिस गुफा में महर्षि रमण ने तप करते थे, वहां चींटियां, छिपकलिया और दूसरे कीट-पतंगों की भरमार थी। तप के दौरान दूर और पास के कई भक्त उन्हें घेरे रहते थे। कुछ समय बाद महर्षि रमण की माता और उनके भाई भी इसी गुफा में साथ रहने लगे।

संस्कृतविद गणपति शास्त्री ने दी ‘महर्षि'(Maharishi)की उपाधि

पलनीस्वामी, शिवप्रकाश पिल्लै और वेंटरमीर जैसे अपने दोस्तों के साथ रमण घंटों तक आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा करते थे। उस वक्त संस्कृत के महान विद्वान गणपति शास्त्री ने उन्हें ‘रामनन’ और ‘महर्षि’ की उपाधियों से सम्मान दिया।

1950 में महाप्रयाण को प्राप्त हुए महर्षि रमण (Maharishi Ramana)

1922 में महर्षि रमण (Maharishi Ramana) की माता का निधन हो गया। जिस स्थान पर महर्षि रमण की माता का अंतिम संस्कार हुआ, उसी के पास श्री रमण आश्रम(Ashram) स्थापित किया गया। 1946 में महर्षि रमण (Maharishi Ramana) की स्वर्ण जयंती मनाई गई। महर्षि रमण के अनुयायी बताते हैं कि 14 अप्रैल 1950 की रात जब महर्षि रमण महाप्रयाण को प्राप्त हुए, उस समय आकाश में एक तीव्र ज्योति का तारा उदय हुआ एवं अरुणाचल की दिशा में अदृश्य हो गया।

कई कहानियां हैं प्रचलित

महर्षि रमण के आश्रम (Maharishi Ramana’s Ashram) में उनकी कई कहानियां प्रचलित हैं। उनके अनुयायी बताते हैं कि महर्षि रमण (Maharishi Ramana) इंसानों के साथ-साथ दूसरे प्राणियों से भी गहरा प्रेम करते थे। उनके आश्रम में गाय, कुत्ता, हिरण, गिलहरी आदि जानवर निश्चिंत होकर घूमते थे।

… जब सांप को इंसानों की तरह समझाने लगा महर्षि रमण (Maharishi Ramana) का सेवक

इसी से जुड़ा महर्षि रमण (Maharishi Ramana) के आश्रम (Ashram) का किस्सा है जो उस वक्त एक अलौकिक और चमत्कारिक घटना थी। महर्षि रमण के अनुयायी बताते हैं कि एक बार श्री रमण आश्रम में यूरोप के लेखक पॉल ब्रंटन महर्षि रमण (Maharishi Ramana) से मिलने आए। कुछ दिनों तक पॉल आश्रम में ही रुकने वाले थे। एक रात पॉल मचान पर सोने की तैयारी कर रहे थे, तभी वहां एक जहरीला सांप आ गया।

पॉल को लगा कि आज उनकी मृत्यु निश्चित है। इससे पहले की सांप आगे बढ़ता, तब तक महर्षि रमण (Maharishi Ramana) का एक सेवक वहां आ गया। सेवक सांप से इंसानों की तरह बात करने लगा। सांप पॉल की तरफ आगे बढ़ रहा था, तभी सेवक बोला-‘ठहरो बेटा’। सेवक के इतना कहते ही सांप एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह रुक गया और वापस मुड़कर चला गया। यह अद्भुत घटना पॉल के लिए चकित करने वाली थी।

उत्सुक्तावश पॉल ने सेवक से पूछा, ‘आखिर तुमने ये चमत्कार कैसे किया?’ सेवक ने कहा- यह मेरा नहीं, महर्षि रमण का चमत्कार है। महर्षि रमण कहते हैं कि दूसरे प्राणियों से अगर हम प्यार से बात करेंगे, तो वह हमारी बात जरूर सुनेंगे।

अपने शिष्य को ऐसे पढ़ाया संकल्प शक्ति का पाठ

महर्षि रमण (Maharishi Ramana) एक कुशल धनुर्धर भी थे। वह रोज अपने शिष्यों के सामने अपनी धनुर्विद्या का प्रदर्शन करते थे। एक बार महर्षि रमण (Maharishi Ramana) ने अपने शिष्य को लेकर जंगल में गए। उन्होंने 100 कदमों की दूरी पर पेड़ पर एक फूल रख दिया और अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर हाथ में तीर से निशाना साधा।

महर्षि रमण ने शिष्य से पूछा कि तुमने मुझे कितनी बार निशाना लगाते हुए देखा है? शिष्य ने जवाब दिया, गुरूजी, मैं तो रोज आपको देखता हूं, आप तो 300 कदम दूर रखे फूल पर भी निशाना लगा सकते हैं। इतना कहते ही महर्षि रमण ने कमान से तीर छोड़ दिया। वह तीर फूल तो दूर, पेड़ के आसपास भी नहीं पहुंचा। महर्षि रमण (Maharishi Ramana) ने शिष्य से पूछा, ‘तीर निशाने पर लगा क्या?’

शिष्य ने उत्तर दिया, ‘’नहीं गुरूजी, तीर तो पेड़ से भी बहुत दूर जा गिरा। मुझे लगा कि आप इस निशाने से संकल्प की शक्ति या अपनी पराशक्तियों का प्रदर्शन करने वाले थे।”इस पर महर्षि रमण हंसते हुए बोले- “मैंने तुम्हें संकल्प शक्ति का सबसे जरूरी पाठ ही तो पढाया है। तुम जिस भी वस्तु की इच्छा करो, अपना पूरा ध्यान उसी पर लगाओ। कोई भी उस लक्ष्य को नहीं भेद सकता, जो दिखाई ही न देता हो।”