के.एम.मुंशी: साहित्य और पर्यावरण से था खास लगाव, डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी करते थे तारीफ

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साभार-गूगल

नई दिल्ली। भारत की आधी से ज्यादा आबादी कृषि पर निर्भर करती है। एक कृषि प्रधान और विशालतम जनसंख्या वाले देश के लिए खाद्य संकट एक गंभीर समस्या बन सकता है। ऐसी समस्याओं के समाधान को लेकर भारत में कई पर्यावरणविदों ने काम किया है। इन्हीं में से एक नाम है कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का।

कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी या के.एम. मुंशी न सिर्फ एक पर्यावरणविद थे, बल्कि एक अच्छे साहित्यकार, वकील, स्वतंत्रता सेनानी और राजनेता भी थे। के.एम. मुंशी की आज जयंती है, तो चलिए जानते हैं कैसा रहा उनका जीवन…

वकालत से शुरू हुआ करियर

30 दिसंबर 1887 को गुजरात के भरूच में जन्मे कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के पिता डिप्टी कलेक्टर थे। के.ए. मुंशी के नाम मशहूर हुए कन्हैयालाल ने अपनी शिक्षा बड़ौदा से हासिल की। बड़ौदा से ग्रैजुएशन की डिग्री लेने के बाद के.एम. मुंशी बंबई चले गए। यहां के.एम. मुंशी  ने वकालत की परीक्षा दी और इस परीक्षा को पास करने के बाद वह हाईकोर्ट में वकील नियुक्त हो गए।

भारत छोड़े आंदोलन में लिया हिस्सा

1938 में के.एम. मुंशी ने भारतीय विद्या भवन की स्थापना की। के.एम. मुंशी ने इस दौरान साहित्य, संस्कृति, कला, धर्म, विज्ञान और पर्यावरण में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। आजादी से पहले भारत छोड़ो आंदोलन में के.एम. मुंशी ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और उन्हें जेल भी जाना पड़ा।

संविधान प्रारूप समिति के सदस्य बने

के.एम. मुंशी एक बार कांग्रेस की सदस्यता छोड़ चुके थे, लेकिन वर्ष 1946 में वह दोबारा कांग्रेस से जुड़ गए। भारत आजाद हुआ और संविधान निर्माण के वक्त के.एम. मुंशी संविधान प्रारूप समिति के सदस्य रहे।

कृषि मंत्री रहते हुए शुरू किया वन महोत्सव सप्ताह

1950 से लेकर 1952 तक के.एम. मुंशी नेहरू मंत्रिमंडल में केंद्रीय कृषि और खाद्य मंत्री रहे। कृषि मंत्री रहते हुए के.एम. मुंशी ने जंगलों में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई को लेकर आवाज उठाई। के.एम. मुंशी ने कृषि और वानिकी को बढ़ावा देने के लिए वन महोत्सव सप्ताह के आयोजन की शुरुआत की। वन महोत्सव सप्ताह के तहत पूरे देश में बड़े स्तर पर वृक्षारोपण किया जाता है।

कांग्रेस से अलग होकर किया स्वराज्य पार्टी का गठन

1952 के बाद के.एम. मुंशी को उत्तर प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त किया गया। 1956 में यूपी के राज्यपाल रहते हुए के.एम. मुंशी कांग्रेस से अलग हो गए। के.एम. मुंशी ने कांग्रेस से अलग होने के बाद स्वराज्य पार्टी का गठन किया। के.एम. मुंशी ने शिक्षा और राष्ट्रनिर्माण के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। 8 फरवरी 1971 को 83 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

बड़े-बड़े विद्वान करते थे तारीफ

के.एम. मुंशी एक लेखक, राजनेता, वकील, पर्यावरणविद और बड़े समाजसुधारक थे। उनके व्यक्तित्व को लेकर बड़े-बड़े साहित्यकार और विद्वान हमेशा तारीफ किया करते थे। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें राष्ट्रीय महत्व के कार्य में अपना जीवन समर्पित करने वाला व्यक्तित्व माना था। वहीं राष्ट्रकवि दिनकर ने उन्हें ‘भारत रत्न, साहित्य रत्न और विद्या रत्न’ की संज्ञा दी।

कई भाषाओं में लिखी 127 पुस्तकें

के.एम. मुंशी के साहित्यिक योगदान की बात करें तो गुजरात से होने के बावजूद उन्होंने विभिन्न भाषाओं में पुस्तकें लिखीं। हिंदी, गुजराती, कन्नड़, मराठी, तमिल, अंग्रेजी आदि भाषाओं में के.एम. मुंशी की कलम ने 127 पुस्तकों की रचना की। के.एम. मुंशी की पहली कहानी ‘मारी कमला’ 1912 में स्त्री बोध नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई। नाटक, कहानी, उपन्यास, जीवनी, निबंध आदि पर के.एम. मुंशी की लेखनी अद्भुत थी।

के.ए. मुंशी की अमर रचना है ‘तपस्विनी’

‘तपस्विनी’ के.एम. मुंशी की ऐसी अमर रचना है, जिसने 1857 से लेकर 1947 तक आजादी के संघर्ष को अपने अंदर समाहित किया है। के.एम. मुंशी ने हिंदू पौराणिक दंतकथाएं भी लिखी। इनमें भगवान परशुराम और कृष्णावतार जैसे पौराणिक आख्यान के साथ, जय सोमनाथ जैसे वृहत् ऐतिहासिक उपन्यास की रचना शामिल है।