काव्य और स्मृतियों का अनूठा संगम: बिल मैनहायर की नई किताब और यादों का सफर

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साहित्य और शायरी की दुनिया में सरहदें मायने नहीं रखतीं। चाहे वह भारत की गलियों में गूंजती उर्दू शायरी हो या न्यूजीलैंड के सुदूर इलाकों में लिखी गई अंग्रेजी कविताएं, मानवीय संवेदनाओं का केंद्र एक ही होता है। इसी कड़ी में न्यूजीलैंड के प्रसिद्ध कवि बिल मैनहायर एक लंबे अंतराल के बाद साहित्य जगत में वापसी कर रहे हैं। फरवरी के मध्य में उनका नया कविता संग्रह ‘लिरिकल बैलेड्स’ प्रकाशित होने जा रहा है। यह संग्रह न केवल उनके पचास साल से अधिक के लेखन करियर का जश्न है, बल्कि स्मृतियों के उस सागर में गोता लगाने जैसा है, जहां अतीत और वर्तमान एक हो जाते हैं।

दर्द और मौसम का आंतरिक संबंध

कविता अक्सर वहां जन्म लेती है जहां इंसान का आंतरिक द्वंद्व होता है। अज़ीज़ ऐजाज़ का वह शेर, “मौसम तो इंसान के अंदर होता है,” बिल मैनहायर की नई रचनाओं पर सटीक बैठता है। मैनहायर का कहना है कि उनके अंदर ‘नॉस्टेल्जिया’ यानी यादों का एक ऐसा स्विच है, जो इस नई किताब में पूरी तरह से ऑन हो चुका है। जिस तरह वकील अख्तर ने कहा था कि उस शख्स के गम का अंदाजा लगाना मुश्किल है जिसे किसी ने रोते हुए नहीं देखा, उसी तरह मैनहायर की कविताएं उन अनकही भावनाओं को जुबां देती हैं जो दशकों से उनके भीतर पल रही थीं। यह संग्रह ते हेरेंगा वाका यूनिवर्सिटी प्रेस (न्यूजीलैंड) और कारकैनेट (यूके और अमेरिका) द्वारा पाठकों तक पहुंचाया जाएगा।

बचपन की आजादी और देहाती जीवन

बिल मैनहायर का जन्म इनवरकारगिल में हुआ था, लेकिन जीवन की धारा उन्हें बहते-बहते वेलिंगटन तक ले आई, जहां वे आज भी निवास करते हैं। साउथलैंड और ओटागो के छोटे-छोटे पबों (सराय) में बीते उनके बचपन ने एक कवि के रूप में उनकी नींव को मजबूत किया। ग्रामीण परिवेश में बड़े होने का मतलब था असीमित स्वतंत्रता—पेड़ों पर बने घर और खुला आसमान।

मैनहायर अपने बचपन को याद करते हुए बताते हैं कि मॉसबर्न का रेलवे होटल उनकी यादों का केंद्र है। उन्हें याद है कि वहां कुछ दुधारू गायें भी हुआ करती थीं। सबसे दिलचस्प किस्सा उस होटल के बगीचे में एक विशाल पेड़ के चारों ओर ‘उड़ने’ की कोशिश करने का है। यह स्मृति उनके जेहन में इतनी गहरी है कि उन्होंने अपनी एक पुरानी किताब ‘अंडर द इन्फ्लुएंस’ में भी इसका जिक्र किया है।

अकेलेपन से कारवां बनने तक का सफर

मैनहायर का साहित्यिक सफर मजरूह सुल्तानपुरी की उस मशहूर पंक्ति को चरितार्थ करता है: “मैं अकेला ही चला था जानिबे-मंज़िल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।” पचास साल पहले जब उन्होंने लिखना शुरू किया था, तब शायद उन्होंने नहीं सोचा होगा कि उनकी कलम का सफर इतना लंबा और विस्तृत होगा। आज भी अगर कोई उस पब में जाए, जैसा कि मैनहायर खुद एक साल पहले गए थे, तो वहां की दीवार पर नाइजेल ब्राउन द्वारा बनाई गई एक पेंटिंग लटकी मिलेगी। इस पेंटिंग में मैनहायर को हवा में तैरते हुए दिखाया गया है, जो उनके बचपन की उस मासूम कोशिश का कलात्मक चित्रण है। वह पेड़ आज भी वहीं खड़ा है, जैसे समय का कोई मौन गवाह हो।

समान उजाले की तलाश

साहित्य की दुनिया में अक्सर यह माना जाता है कि “न किसी की आंख का नूर हूं, न किसी के दिल का क़रार हूं,” जैसा कि ज़फ़र ने लिखा था, लेकिन एक सच्चा कवि अपनी रचनाओं के जरिए हमेशा दूसरों के काम आता है। मैनहायर की यह नई पेशकश उसी परंपरा को आगे बढ़ाती है। वसीम बरेलवी का यह शेर कि “तिरे चराग़ अलग हों, मिरे चराग़ अलग, मगर उजाला तो फिर भी जुदा नहीं होता,” इस बात का सबूत है कि चाहे वह फैज़ की क्रांतिकारी शायरी हो या मैनहायर की ‘लिरिकल बैलेड्स’, सबका मकसद इंसानियत के साझे दर्द और उजाले को बयां करना है। फरवरी में आने वाली यह किताब निश्चित रूप से पाठकों को यादों की उस दुनिया में ले जाएगी जहां दर्द, खुशी और पुरानी यादें एक साथ सांस लेती हैं।